"विशेष विश्लेषण | क्या हिंसा किसी आंदोलन को सफल बनाती है, या लोकतंत्र की ताकत शांतिपूर्ण विरोध में है?"

क्या विरोध का अधिकार हिंसा की अनुमति देता है?

लोकतंत्र में अपनी बात रखना, सरकार से सवाल पूछना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी शांति, अनुशासन और नैतिकता होती है, न कि हिंसा।

यदि किसी प्रदर्शन के दौरान पत्थरबाजी, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या पुलिस एवं अन्य लोगों पर हमला होता है, तो ऐसे कृत्य कानून के दायरे में आते हैं और उन्हें उचित नहीं ठहराया जा सकता। वहीं, कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे कानून और मानवाधिकारों के अनुरूप संयम और उचित प्रक्रिया का पालन करें।

राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी है कि वे जनता, विशेषकर युवाओं और छात्रों, को शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीकों से अपनी बात रखने के लिए प्रेरित करें, न कि किसी भी प्रकार की हिंसा या टकराव को बढ़ावा दें।

मेरी देश के सभी छात्र-छात्राओं से अपील है—

अपने भविष्य को किसी भी राजनीतिक टकराव की भेंट न चढ़ने दें। अपनी आवाज़ अवश्य उठाइए, लेकिन संविधान के दायरे में रहकर। यदि कोई समस्या है, तो छात्र संगठन, संवाद, ज्ञापन, न्यायालय और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से समाधान खोजिए। इतिहास गवाह है कि शांतिपूर्ण और अनुशासित आंदोलनों ने समाज में सबसे स्थायी परिवर्तन किए हैं।

याद रखिए—

"पत्थर से नहीं, विचारों से परिवर्तन आता है।
हिंसा से नहीं, संविधान और संवाद से लोकतंत्र मजबूत होता है।"

आइए, ऐसा भारत बनाएं जहाँ विरोध भी हो, लेकिन मर्यादा के साथ; असहमति भी हो, लेकिन संविधान के सम्मान के साथ; और युवाओं की ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगे, न कि हिंसा और टकराव में।

विश्लेषक: हर्ष राज पाण्डेय
Live India News
National Chief General Secretary
Akhil Bhartiya Patrakar Association

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