"भरत भूषण तिवारी: एक अधूरी लड़ाई, जो आज भी न्याय मांग रही है"
🕯️ "क्या भरत भूषण तिवारी को न्याय मिलेगा?"
एक सवाल... जो आज सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है।
कहते हैं कि जब इंसान ज़िंदा होता है, तब उसकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है, लेकिन उसके जाने के बाद वही आवाज़ पूरे समाज में गूंजने लगती है। आज कुछ ऐसा ही नाम है — भरत भूषण तिवारी।
गाँव के लोगों का कहना है कि भरत कोई अपराधी नहीं, बल्कि अपने गाँव, अपने समाज और बाढ़ पीड़ितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाला एक जागरूक और संघर्षशील युवा था। जब बाढ़ से लोग परेशान थे, जब ग्रामीण अपनी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे थे, तब भरत ने उन समस्याओं को शासन और प्रशासन तक पहुँचाने का प्रयास किया। उसने अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाए, जनप्रतिनिधियों से मुलाकात की और जिम्मेदार लोगों के सामने अपनी बात रखी।
यदि ग्रामीणों के दावे सही हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उसकी बात समय रहते सुनी गई?
यदि किसी नागरिक की शिकायतें और जायज़ मांगें समय पर सुन ली जाएँ, तो शायद कई बड़े विवाद और दुखद घटनाएँ टाली जा सकती हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि आम नागरिक बिना डर के अपनी बात कह सके और व्यवस्था उसे गंभीरता से सुने।
आज जब भरत इस दुनिया में नहीं है, तब उसके घर नेताओं, अधिकारियों और सामाजिक संगठनों का आना-जाना लगा हुआ है। हर कोई संवेदना व्यक्त कर रहा है, न्याय की बात कर रहा है। लेकिन मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है—
अगर यही संवेदनशीलता उस समय दिखाई गई होती, जब भरत अपनी लड़ाई लड़ रहा था, तो क्या आज उसके माता-पिता को अपने बेटे की तस्वीर के सामने आँसू बहाने पड़ते?
अगर उसकी समस्याओं का समाधान समय रहते कर दिया गया होता, अगर उसकी बातों को गंभीरता से लिया गया होता, तो शायद आज भरत अपने गाँव के युवाओं के लिए प्रेरणा बनकर खड़ा होता। वह समाज सेवा के अपने कार्यों को आगे बढ़ा रहा होता और अपने सपनों को साकार कर रहा होता।
आज उसके माता-पिता के आँसू सिर्फ एक बेटे को खोने का दर्द नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था से भी सवाल हैं, जिसने एक नागरिक की आवाज़ को समय रहते नहीं सुना।
न्याय केवल अपराधियों को सजा देने का नाम नहीं है। न्याय का अर्थ यह भी है कि भविष्य में किसी दूसरे भरत को अपनी बात मनवाने के लिए अपनी जान की कीमत न चुकानी पड़े। ऐसी व्यवस्था बने जहाँ आम आदमी की आवाज़ को महत्व मिले, उसकी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो और जवाबदेही तय हो।
आज आवश्यकता केवल श्रद्धांजलि देने की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की भी है। यह सोचने की है कि कहीं हमारी व्यवस्था ऐसी तो नहीं बन गई है, जहाँ किसी की पीड़ा तभी दिखाई देती है, जब बहुत देर हो चुकी होती है।
भरत भूषण तिवारी अब लौटकर नहीं आएँगे। लेकिन यदि उनके संघर्ष से व्यवस्था कुछ सीख ले, यदि निष्पक्ष जाँच हो, यदि दोषी कोई भी हो तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो, और यदि भविष्य में किसी नागरिक की आवाज़ समय रहते सुनी जाए—तभी यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
"एक समाज तब मजबूत बनता है, जब वह अपने संघर्ष करने वाले लोगों की आवाज़ को उनके जीवित रहते सुनता है, न कि उनके चले जाने के बाद।"
✍️ हर्ष राज पाण्डेय
एडिटर इन चीफ - लाइव इंडिया न्यूज24, राष्ट्रीय प्रधान महासचिव - अखिल भारतीय पत्रकार एसोसिएशन, राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी - भारती किसान यूनियन, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - ब्राह्मण उत्थान सेवा संस्थान
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