“क्या इन बेजुबानों को जीने का अधिकार नहीं?”
“बेजुबानों की भी एक दुनिया है…”
सड़कों पर भटकते ये बेजुबान सिर्फ जानवर नहीं हैं, बल्कि हमारी संवेदनाओं की परीक्षा हैं।
जिस समाज में इंसानियत जिंदा होती है, वहाँ कमजोरों और बेजुबानों के लिए भी जगह होती है।
आज देश में आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने एक नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए स्कूलों, अस्पतालों और भीड़भाड़ वाले इलाकों से स्ट्रे डॉग्स को हटाने और खतरनाक या रेबीजग्रस्त कुत्तों पर कड़ी कार्रवाई की बात कही है।
लेकिन सवाल सिर्फ कानून का नहीं है…
सवाल इंसानियत का भी है।
क्या इन बेजुबानों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे सड़क पर पैदा हुए?
क्या इनके हिस्से में सिर्फ पत्थर, डर और मौत ही आएगी?
ये वही जीव हैं जो कभी इंसानों के सबसे वफादार साथी कहलाते हैं।
कभी किसी घर की चौखट की रखवाली करते हैं, तो कभी रात के अंधेरे में किसी अनजान खतरे से मोहल्ले को सतर्क करते हैं।
अगर आज इनमें आक्रामकता बढ़ रही है, तो उसके पीछे भूख, भय, हिंसा और उपेक्षा भी एक बड़ी वजह है।
देश में डॉग बाइट की घटनाएं बढ़ी हैं, यह चिंता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी लाखों डॉग बाइट मामलों और कई मौतों का हवाला देते हुए राज्यों को जिम्मेदारी निभाने को कहा है।
लेकिन इसका समाधान सिर्फ “हटाओ” या “मारो” नहीं हो सकता।
समाधान यह है कि —
हर शहर में आधुनिक डॉग शेल्टर बनाए जाएं
नसबंदी और वैक्सीनेशन अभियान तेज हों
आक्रामक जानवरों के लिए अलग पुनर्वास केंद्र हों
पशु क्रूरता करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो
और समाज में पशुओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाई जाए
क्योंकि सभ्यता की पहचान सिर्फ ऊँची इमारतों से नहीं होती,
बल्कि इस बात से होती है कि हम अपने से कमजोर जीवों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।
आज जरूरत है संतुलन की…
जहाँ इंसानों की सुरक्षा भी बनी रहे और बेजुबानों का अस्तित्व भी।
अगर सरकारें चाहें तो हर शहर में सुरक्षित “एनिमल ज़ोन” बनाए जा सकते हैं।
अगर समाज चाहे तो डर की जगह दया पैदा हो सकती है।
और अगर इंसान चाहे…
तो ये बेजुबान भी इस दुनिया में सम्मान के साथ जी सकते हैं।
क्योंकि धरती सिर्फ इंसानों की नहीं है।
इन बेजुबानों का भी इस दुनिया पर उतना ही हक है जितना हमारा।
“बेजुबानों को भी जीने का हक है…”
सड़क किनारे बैठा वह कुत्ता…
जिसे लोग अक्सर पत्थर मारकर भगा देते हैं,
वह भी दर्द महसूस करता है।
उसे भी भूख लगती है।
उसे भी ठंड, बारिश और डर सताता है।
लेकिन सबसे बड़ा दर्द उसे तब होता है,
जब इंसान उसे यह एहसास दिला देता है कि इस दुनिया में उसके लिए कोई जगह नहीं।
आज देश में आवारा कुत्तों को लेकर बहस तेज है।
कहीं डॉग बाइट की घटनाएं हैं, कहीं लोगों में डर है, तो कहीं प्रशासन और अदालतें सख्त फैसले लेने की बात कर रही हैं।
लेकिन इस पूरे मुद्दे के बीच एक सवाल बार-बार खड़ा होता है —
क्या हर गलती की सजा सिर्फ इन बेजुबानों को मिलेगी?
ये बेजुबान पैदा तो इंसानों की दुनिया में होते हैं,
लेकिन इन्हें न घर मिलता है, न भोजन, न सुरक्षा।
कई बार इन्हें मारा जाता है, गर्म पानी डाला जाता है, गाड़ियों से कुचला जाता है, जहर तक दे दिया जाता है।
फिर जब यही जीव डर और हिंसा के कारण आक्रामक हो जाते हैं, तो समाज इन्हें “खतरा” कहने लगता है।
सच्चाई यह है कि कोई भी जानवर जन्म से हिंसक नहीं होता।
उसे परिस्थितियाँ हिंसक बनाती हैं।
भूख, मारपीट, डर और लगातार अपमान उसके व्यवहार को बदल देते हैं।
हमें यह समझना होगा कि समस्या “डॉग” नहीं है,
समस्या हमारी संवेदनहीनता है।
अगर शहरों में पर्याप्त शेल्टर हो,
अगर समय पर नसबंदी और वैक्सीनेशन हो,
अगर घायल और आक्रामक जानवरों के लिए पुनर्वास केंद्र हों,
तो इंसानों और बेजुबानों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
लेकिन सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी काफी नहीं है।
समाज को भी आगे आना होगा।
एक अपील — इंसानियत के नाम
अगर हर वह इंसान जो खुद को “एनिमल लवर” कहता है,
सड़क से सिर्फ एक डॉग को भी एडॉप्ट कर ले…
तो शायद देश की हर गली में भटक रहे बेजुबानों को एक परिवार मिल जाए।
सोचिए…
जिस जीव को पूरी जिंदगी सड़क पर पत्थर और लात मिली हो,
उसे अगर पहली बार कोई प्यार से पुकारे,
तो उसके लिए वह पल किसी जन्नत से कम नहीं होगा।
एक छोटा सा कदम —
किसी बेजुबान की पूरी जिंदगी बदल सकता है।
एडॉप्ट करने का मतलब सिर्फ उसे घर देना नहीं है,
बल्कि उसे यह एहसास दिलाना है कि —
“तुम अकेले नहीं हो…”
आज जरूरत है कि लोग महंगे विदेशी नस्ल के कुत्तों के पीछे भागने के बजाय,
सड़क पर रहने वाले भारतीय देसी डॉग्स को अपनाएं।
ये बेहद वफादार, समझदार और मजबूत होते हैं।
बस इन्हें चाहिए थोड़ा प्यार, थोड़ा खाना और थोड़ा अपनापन।
समाज से एक सवाल
जब इंसान अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाता है,
तो क्या इन बेजुबानों को जीने का अधिकार नहीं?
धरती पर सिर्फ इंसानों का अधिकार नहीं है।
प्रकृति ने हर जीव को जीने का समान हक दिया है।
अगर हम सच में सभ्य समाज कहलाना चाहते हैं,
तो हमें अपनी इंसानियत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं रखनी होगी।
सरकार और प्रशासन से मांग
हर जिले में आधुनिक डॉग शेल्टर बनाए जाएं
बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन और नसबंदी अभियान चलें
पशु क्रूरता कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए
स्कूलों और समाज में पशु प्रेम को लेकर जागरूकता अभियान चलें
घायल और आक्रामक जानवरों के लिए विशेष पुनर्वास केंद्र बनाए जाएं
अंत में…
किसी बेजुबान को खाना खिलाना दान नहीं,
इंसानियत है।
किसी घायल जानवर का इलाज करवाना एहसान नहीं,
कर्तव्य है।
और किसी आवारा डॉग को अपनाना सिर्फ “पेट रखना” नहीं,
बल्कि एक जिंदगी बचाना है।
आइए…
डर नहीं, दया फैलाएं।
नफरत नहीं, अपनापन दें।
और इन बेजुबानों को भी इस समाज में सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिलाएं।
विश्लेषक : हर्ष राज पाण्डेय
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