"सुप्रीम कोर्ट का आदेश और बेजुबानों का दर्द”
सड़कों के बेजुबान और इंसानियत का इम्तिहान
विश्लेषक : हर्ष राज पाण्डेय
एडिटर इन चीफ, लाइव इंडिया न्यूज 24
देश की अदालतों में जब भी किसी बड़े मुद्दे पर बहस होती है, तो उसका असर सिर्फ कानून की किताबों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की आत्मा तक पहुंचता है। इन दिनों देश में आवारा कुत्तों को लेकर छिड़ी बहस भी कुछ ऐसी ही है — जहां एक तरफ इंसानों की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ उन बेजुबान जीवों का अस्तित्व, जिनकी पूरी जिंदगी सड़कों की धूल, भूख, मार और तिरस्कार के बीच गुजर जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने और उनकी संख्या नियंत्रित करने को लेकर सख्त रुख दिखाया है। अदालत की चिंता गलत नहीं कही जा सकती, क्योंकि देश में डॉग बाइट और रेबीज जैसी घटनाओं ने कई परिवारों को दर्द दिया है। किसी मासूम बच्चे की मौत, किसी बुजुर्ग पर हमला या किसी गरीब परिवार की जिंदगी का उजड़ जाना बेहद दुखद है। एक संवैधानिक संस्था होने के नाते अदालत का पहला कर्तव्य नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हर समस्या का हल सिर्फ “हटाना” या “खत्म कर देना” ही होता है?
क्या सड़क पर जन्म लेना उनका अपराध है?
जो कुत्ते आज सड़कों पर भटक रहे हैं, क्या उन्होंने खुद यह जिंदगी चुनी थी?
उन्होंने तो न आलीशान घर मांगा, न महंगे खाने की ख्वाहिश की। उन्हें तो बस दो वक्त की रोटी, थोड़ी छांव और इंसानों के बीच थोड़ी सी जगह चाहिए थी। लेकिन बदले में उन्हें क्या मिला?
कभी पत्थर, कभी लाठी, कभी गर्म पानी, तो कभी गाड़ियों के नीचे कुचलती हुई मौत।
यह वही जीव हैं जो रातभर मोहल्लों की रखवाली करते हैं। अजनबी के आने पर सबसे पहले भौंकते हैं। कई बार बच्चों के साथ खेलते हैं, कई बार भूखे रहकर भी इंसानों की तरफ उम्मीद से देखते हैं। लेकिन जब उनकी संख्या बढ़ती है, जब व्यवस्था विफल होती है, तब पूरा दोष उन्हीं के सिर मढ़ दिया जाता है।
असली जिम्मेदार कौन?
सवाल यह है कि आखिर इतने आवारा कुत्ते सड़कों पर आए कैसे?
क्या यह प्रशासनिक विफलता नहीं है?
वर्षों तक नगर निगमों ने नसबंदी अभियान को गंभीरता से नहीं लिया। पशु आश्रय गृहों की संख्या बेहद कम रही। शहरों में कचरे के पहाड़ खड़े होते गए, जिससे जानवरों को भोजन मिलता रहा और उनकी संख्या बढ़ती गई। लेकिन सरकारें योजनाओं की फाइलों में व्यस्त रहीं।
आज जब हालात नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं, तो सबसे आसान रास्ता चुना जा रहा है — “उन्हें हटा दो।”
लेकिन क्या कोई यह पूछेगा कि जिन बेजुबानों को हटाया जाएगा, उन्हें रखा कहां जाएगा?
क्या इंसानियत अब सिर्फ भाषणों तक सीमित है?
हमारा देश दुनिया को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देता है। हम गाय, नदी, पेड़ और प्रकृति को पूजने वाली संस्कृति की बात करते हैं। लेकिन क्या उसी संस्कृति में उन बेजुबान जानवरों के लिए जगह नहीं बची, जो इंसानों के बीच ही जीना सीख गए?
सरकारें हजारों करोड़ रुपये सड़कों, इमारतों, प्रचार और आयोजनों पर खर्च कर देती हैं। तो क्या हर जिले में आधुनिक पशु शेल्टर नहीं बनाए जा सकते?
क्या हर शहर में:
- नसबंदी केंद्र,
- रेबीज वैक्सीनेशन यूनिट,
- डॉग शेल्टर,
- और पशु चिकित्सा व्यवस्था विकसित नहीं हो सकती?
अगर इच्छाशक्ति हो, तो यह असंभव नहीं है।
मौत नहीं, व्यवस्था चाहिए
समस्या का समाधान क्रूरता नहीं, व्यवस्था है।
यदि किसी कुत्ते को रेबीज है या वह अत्यधिक आक्रामक है, तो चिकित्सकीय निर्णय अलग हो सकता है। लेकिन हर सड़क के जानवर को खतरा मान लेना भी न्याय नहीं कहा जा सकता।
एक सभ्य समाज वही होता है, जहां इंसानों की सुरक्षा और जानवरों के अधिकार — दोनों के बीच संतुलन बनाया जाए।
आखिर इंसानियत बची कहां है?
आज सबसे बड़ा डर यह नहीं कि सड़कों पर कुत्ते बढ़ गए हैं।
सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं इंसानों के दिल छोटे न हो गए हों।
जब कोई भूखा कुत्ता किसी होटल के बाहर बैठा रहता है, तो वह सिर्फ रोटी नहीं मांगता… वह इंसानियत तलाशता है।
जब कोई घायल पिल्ला सड़क किनारे तड़पता है, तो वह सिर्फ इलाज नहीं चाहता… वह यह जानना चाहता है कि इस दुनिया में दया अभी जिंदा है या नहीं।
निष्कर्ष
देश को कठोर फैसलों से पहले संवेदनशील समाधान खोजने होंगे।
जरूरत इस बात की है कि:
- बड़े स्तर पर नसबंदी हो,
- हर जिले में शेल्टर बनें,
- पशु चिकित्सा सेवाएं मजबूत हों,
- और लोगों में जागरूकता फैलाई जाए।
क्योंकि किसी भी सभ्यता का स्तर इस बात से तय होता है कि वह अपने सबसे कमजोर जीवों के साथ कैसा व्यवहार करती है।
और शायद… इन बेजुबानों को सिर्फ कानून नहीं, थोड़ी सी मोहब्बत, थोड़ी सी जगह, और जीने का अधिकार चाहिए।
Comments
Post a Comment